श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 - सांख्य योग : जब श्रीकृष्ण ने अर्जुन के आँसुओं को ज्ञान में बदल दिया
प्रस्तावना: मोह से मुक्ति की ओर पहला कदम कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो सेनाओं का संघर्ष नहीं, बल्कि मनुष्य के मन में चलने वाले अंतर्द्वंद्व का जीवंत रूप था। जब महारथी अर्जुन अपने ही गुरुजनों और स्वजनों को सामने देखकर मोह-शोक से व्याकुल हुए, तो उन्होंने अपना धनुष 'गांडीव' त्याग दिया। इसी विकट क्षण में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो दिव्य ज्ञान दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय ‘सांख्य योग’ कहलाया। यह गीता का हृदय है, जहाँ से जीवन को देखने का दृष्टिकोण सदा के लिए बदल जाता है। कुरुक्षेत्र के विशाल युद्ध क्षेत्र में स्वर्ण रथ पर बैठे उदास अर्जुन और उन्हें सांत्वना देते हुए ओजस्वी श्रीकृष्ण। 1. आत्मा का शाश्वत सत्य: शरीर नश्वर, आत्मा अमर श्रीकृष्ण सबसे पहले अर्जुन के मृत्यु-भय और अज्ञान को दूर करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि जिसे हम मृत्यु समझते हैं, वह केवल शरीर का परिवर्तन है। “वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥” वस्त्र का रूपक: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, ठीक वैस...